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  • संपादकीयम्

    Sampadkeeyam

    Publisher: Parilekh Prakashan

    Pages: 136
    Language: Hindi
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Description

संपादकीयम्

अख़बार का दोहरा दायित्व होता है पाठक और जनतंत्र की ओर! ख़बरें लिखने वालों की जवाबदेही उनके पाठकों की ओर होती है! वह संपादकीय ही है जो जनतंत्र का प्रहरी बन खड़ा होता है, डटा रहता है! वह पाठकों की ओर कम और सत्ता की, सरकार की तथा लोकतंत्र के बाकी लठधारियों की ओर अधिक उन्मुख होता है!

शायद यही कारण है कि रीडरशिप सर्वे बार-बार यह दिखाते हैं कि पाठक संपादकीयों को कम पढ़ते हैं! पर मुझे लगता है, यह बात ‘संपादकीयम्’ के लिए सच नहीं है. पाठकों की प्रतिक्रियाओं से यह साफ है कि वे इन्हें बहुत ग़ौर से पढ़ते हैं - उन्हें यह उम्मीद तो नहीं रहती कि लठधारी कुछ उत्तर भी देंगे, पर वे इनमें उठाए प्रश्नों के साथ खड़े हैं! ये उन्हीं के प्रश्न हैं!

और जब इन प्रश्नों में कुछ तंज उभर आता है, कोई व्यंग्य चोट करता है, चुभता है – तो वह उन्हें भी उतना ही चुभता है जितना सत्ता या लठधारियों को! क्योंकि जनतंत्र का सबसे बड़ा गुंडा तो ‘जन’ ही है! उस ही के वोटों ने इस बाज़ीचा-ए-अतफ़ाल (बच्चों के खेलने की जगह) को सलामत रखा है!

- कुमार लव

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