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  • दर्शनशास्त्र

    Darshana Shastr

    Author:

    Pages: 284
    Language: Hindi
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Description

यह सिर्फ ईसा पूर्व के जमाने से चले आ रहे दर्शनों का परिचय देने का छोटा सा प्रयास भर है।

'मजदूर वर्ग के पुरुषों, महिलाओं और विद्यार्थियों को यह किताब जरुर पढ़नी चाहिए। मैंने सिर्फ इन्हीं पाठकों को ध्यान में रखा। इन पाठकों के लिए महत्व रखने वाली किताबें आसानी से समझ आने वाली शैली में लिखी जानी चाहिए। अन्यथा, अगर इस तरह नहीं लिखा गया तो इन का कोई उपयोग नहीं हो सकेगा।

इस किताब में जहाँ-तहाँ प्रयोग किए गए उद्धरणों के बारे में भी स्पष्टीकरण देना मेरे लिए जरुरी हो जाता है। कुछ उद्धरणों को मैंने जस का तस उठा लिया। कुछ उद्धरणों को मैंने कुछ शब्दों में संशोधन करने के बाद प्रस्तुत किया है ताकि वे आसानी से समझे जा सकें। मैंने जहाँ जरुरी लगा, वहाँ अंतिम स्वरों को कुछ और लंबा खींचा (एक से ज्यादा संज्ञाएँ होने की स्थिति में, हर संज्ञा के अंत में, ताकि 'और' व 'या' जैसे समुच्चय बोधक शब्द व्यक्त किए जा सके), प्रत्यय लगाए (यदि एक से अधिक संज्ञाएँ हों तो हर संज्ञा के लिए). अल्पविराम आदि भी लगाए। अगर ये बदलाव न किए जाते, तो बोधगम्यता का प्रश्न ही नहीं उठता।

इस किताब को लिखने के लिए मैंने जो किताबें पढ़ीं, उन की सूची इस किताब के अंत में दी गई है। उन में से अधिकांश किताबें दुकानों या पुस्तकालयों में आसानी से उपलब्ध होती हैं। इन में से कम से कम कुछ किताबें तो पढ़नी ही चाहिए। अगर चाहें, तो इन किताबों के कवर्स पर अपनी टिप्पणियाँ भी लिखी जा सकती हैं। हालाँकि, यह सुविधा तो सिर्फ तब ही मिल सकेगी जब किताबें खुद अपनी ही हों।

दर्शन क्या है और इस का इतिहास क्या है, इस से हम भला पूरी तरह अनजान क्यों बने रहें? इसके बारे में कुछ न कुछ जान लेना अच्छा ही है, है न? अब, मैंने तो इस ज्ञान को अपने पास न फटकने देने की गलती को सुधार लिया है। दर्शन से कुछ हद तक जान-पहचान कर लेना वाकई बहुत जरुरी है। हम जानेंगे कि समाज के लिए यह किस हद तक जरुरी है।

- रंगनायकम्मा

नोट: " दर्शनशास्त्र " ईबुक का आकार 6 mb है
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