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  • यात्रा क्रम (प्रथम भाग)

    Yatra Kram Pratham Bhag

    Pages: 182
    Language: Hindi
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Description

संपत देवी मुरारका को यात्रा करनॆ का बहुत शौक रहा है। संपत देवी पहले तो समय मिलते ही संगी सहेलियों कॆ साथ तीर्थाटन पर निकल पडती थीं। आगॆ चलकर अन्य कारणों सॆ यात्राएं करती रहीं। अभी भी महीनॆ दो महीनॆ मॆं एकाध यात्रा कर लेती हैं। स्वाभाविक है यात्राऒं कॆ बीच विभिन्न दृश्यावलोकन सॆ भावुक एवं संवेदनशील मन कई अनुभवों एवं भावों सॆ भर उठता है। पुनः विचारॊं कॆ उथल-पुथल सॆ बॆचैन मन की विश्रांति पानॆ कॆ लिए उन्हॆ कागज पर उतारकर इसॆ सजीव बना लॆती हैं।

* * *

संपत देवी अपनॆ इन्हीं अनुभवों कॆ सिलसिलॆ बुनती रही हैं। यात्रा का स्वरूप कागज पर शब्द बनकर उतरनॆ लगॆ। फिर एक नयॆ क्रम का निर्माण हुआ। जिसका नामकरण हुआ – यात्रा क्रम I|

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