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  • कुछ कोलाहल, कुछ सन्नाटा

    Kuch Kolahal Kuch Sannata

    Publisher: Parilekh Prakashan

    Pages: 120
    Language: Hindi
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Description

‘कुछ कोलाहल, कुछ सन्नाटा' में संकलित गुर्रमकोंडा नीरजा की कविताओं को पढ़ते हुए कुछ पुराने और कुछ नए सवाल मानस पटल पर आ घुमड़ते हैं; और अच्छी कविता की यही पहचान है कि वह अपने भाषिक जादू से थोड़ी देर विचलित कर फिर फुर्र हवा में न उड़ जाए। गुर्रमकोंडा नीरजा की कविता की खासियत ही यह है कि वह सवाल पैदा कर फिर पकड़ ही लेती है कि हम उसका उत्तर पाने के लिए भीतर-ही-भीतर बेचैन हो जाएँ। उनकी कविताओं सूक्तिवाचक छौंक नहीं हैं बल्कि छोटे आकार की होने पर भी एक खास किस्म की विस्तृति का भाव वे जगाती हैं। मुझे बहुत वर्षों पहले पढ़ी तेलुगु की एक लोकगीतात्मक पंक्ति की याद आती है जिसका आशय था माँ की कोख में पलने वाली बेटी के लिए संबोधन। बस माँ उस बेटी को संबोधित कर रही है इतना ही। अभी तो बेटी संसार में आई भी नहीं थी इसलिाए उसे संवाद नहीं कहा जा सकता। वह कोई एकालाप भी नहीं जो बेटी के पैदा होने के विलाप का सूत्र हो; बल्कि जब बेटी आ रही है, तो दुनिया और समाज के द्वारा उसके साथ क्या खेल होगा, एक सच्ची माँ उससे छिपाएगी नहीं। यही भाव गुर्रमकोंडा नीरजा की कुछ कविताओं में उभरता है। 'माँ!' शीर्षक कविता में कवयित्रि आद्य कृतज्ञता के भाव को प्रकट करते हुए कहती हैं -
कोख में अपने रक्त-मांस से सींचकर
उसने मुझे जन्म दिया
और अपनी छाती चीर कर
पिलाया दूध
.....................
मैं काले कोसों बैठी हूँ
सात समंदर पार
लाचार
मन तो कभी का पहुँच चुका उसके पास,
तन काट नहीं पा रहा
परिस्थिति का पाश।
उदास हूँ,
दास हूँ न?
स्वामी की अनुमति नहीं!

और इस मित कथन में समूचे महाकाव्यात्मक विन्यास को जैसे गुर्रमकोंडा नीरजा ने तिलस्माती ढंग से संपृक्त कर आधी-आबादी की युगों-युग पुरानी दासता को बिंबित कर दिया हो। सरल सहज भाषा में उस त्रास के गुंफन का स्फोट जैसे नैसर्गिक दुखांतकी का निःशब्द क्रंदन हो। जिस लोकसंगीगात्मक लय की स्मृति का उल्लेख पहले किया गया है उसका आधुनिक बौद्धिक संस्करण जैसे 'माँ' कविता की अंतिम पंक्तियों में आलोकित हो उठा हो। यह आकस्मिक नहीं है। एक धारावाही प्रक्रिया का ही हिस्सा है। स्वामित्व की परितृप्ति महज एक दुःखद स्मृति की अरण्यगाथा जैसी है। यह मूल भाव स्त्री के प्रारब्ध में निबद्ध है। परिस्थिति की यह कारा कोई स्वाभाविक कारा नहीं है या अस्थायी भाव नहीं है बल्कि वह बेटी की अवतारणा के साथ ही अमिट रेखा सी दुर्गम और अलंघ्य है।
पसरी रहती थी
अजीब-सी खामोशी
मन के गुफांधकार में...

उपरोक्त काव्य कथन का गठन स्वयं में कविता का एक ऐसा भाग है जिसे स्वतंत्र रूप से देखा जाए तो एक गहरे अंतराल को जाग्रत कर उसे वस्तुजगत की हलचलों के भीतर अर्थमय रूप से टोहना है अर्थात यह खामोशी जो अपनी विशेषता के कारण विचित्र है वास्तव में मन के उस सातत्यपूर्ण अंधकार को व्यंजित करती है जो स्त्री के प्रारब्ध के साथ जुड़ा है।
किसने कहा कि
मैं अधूरी हूँ
किसने कहा कि
मैं अकेली हूँ?

कविता की उक्त पंक्तियों में अर्थ की जो परत उभरती है वह स्पष्ट करती है कि हाँ, हमारे सामाजिक विज्ञान में स्त्री को अधूरा कहा जाता है। वह अधूरापन अबला होने के कारण नहीं, बल्कि उसकी पूर्णता का बिंदु पुरुष है और पूर्णता की इस पहचान के लिए वह विवश है कि पुरुष के साथ रहे। हमारे प्राचीन समाजों में उसे इसी तरह के अस्वाभाविक संधियों के लिए तैयार किया जाता रहा है। नैतिकता का सारा दारोमदार उस पर थमाया जाता रहा है। पुरुष नियोग के जरिए अपने वर्चस्व को बनाए रखने की व्यवस्था को शास्त्रोक्त सिद्ध करता रहा और हर निर्णय के लिए स्वयं स्वतंत्र रहा है। यह स्वीकार करना थोड़ा कठिन है। इसकी सांकेतिक पड़ताल के लिए ‘तीन शब्द’ कविता का उल्लेख करना अनिवार्य जान पड़ता है -
तीन शब्द...
हाँ ! तीन ही शब्द
नफरत!
शक!!
डर!!!
बोए और काटे जा रहे हैं हर वक्त
रिश्तों की जड़ों में सींचकर ज़हर!

स्थूल रूप से शेष कविताएँ संधि-पत्र की तरह हैं क्योंकि अस्तित्व के लिए और कोई विकल्प नहीं है। परंतु मुख्य स्वर नीरजा की कविताओं से उभरता है वह ‘खतरे में बेटियाँ’’ कविता में प्रतिफलित होता है। छोटी-छोटी कविताओं में उल्लास, उन्मुक्तता, आशा की जो छवियाँ उभरती हैं - उनकी अंतर्धाराओं के संकेत उस भयावह के समक्ष कोई अर्थ नहीं रखते जो पुराने समय से अब तक अनवरत हिंसात्मक बना हुआ है। समूचा प्रेम प्रकरण स्त्री के भाग्य में छलावे के अतिरिक्त कुछ नहीं है। यद्यपि भारतीय समाज के अन्याय को लेकर अपनी स्त्रैण प्रतिरोधात्मकता का असहमतिवाची स्वर विलाप के रूप में नीरजा ने व्यक्त नहीं किया तथापि नारी के प्रति पक्षपातपूर्ण दृष्टि है। यह भाव नीरजा की उल्लासपूर्ण अभिव्यक्ति में भी अक्षत है। कहना पडे़गा कि स्त्री के सीमांत से उभरने वाली सम्यक दृष्टि स्वीकार और अस्वीकार की मर्यादाओं के बीच है, वही मध्यम मार्ग नीरजा की कविताएँ प्रस्तावित करती हैं जो अस्त्वि के लिए अनिवार्य है। परंतु ये कविताएँ छोटी, सीधे प्रश्न उठानेवाली और सरल होते हुए भी प्रतिरोधी वृत्ति की पक्षधर हैं और जब तक अन्याय रहेगा वे बराबर उस पर प्रहार करती रहेंगी।
अभी यह शुरूआत है। मुझे उम्मीद है सोशल मीडिया में इन पर गौर किया जाएगा और मुद्रित रूप में भी संरक्षण योग्य सामग्री के रूप में याद रखी जाएँगी।

- गंगा प्रसाद विमल

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