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  • खेतों की पुकार

    Kheton Ki Pukar

    Pages: 87
    Language: Hindi
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Description

जहाँ तक “खेतों की पुकार” की कविताओं का सम्बन्ध है, जिन्हें कवि शेषेन्द्र ने चमत्कारिकाएं कह कर पाठक को चमत्कृत करने का प्रयास किया है, इनके शब्द-शब्द में चमक हो या न हो लेकिन ‘आग’ अवश्य है। एक सन्देश है, ऐसा ‘सन्देश’ जो निरन्तर संघर्षरत रहने की प्रेरणा देता है, जिसके माध्यम से सहृदय पाठक की समझ बनती है कि भूमि में दाना भी तब तक अंकुरित होकर पौधे का स्वरूप धारण नहीं करता जब तक कि भूमि को खोद पाड़कर, उसकी समुचित जुताई, गुड़ाई करके उसमें पर्याप्त नमी संचित नहीं कर दी जाती।

कवि शेषेन्द्र पुनरपि-पुनरपि किसान को शस्त्र उठाने का आह्वान करते हैं, यहाँ तक कि हल को ही शस्त्र के रूप में काम में लाने के लिए प्रेरित करत करते हैं। नहीं, यहाँ मैं दो चार उदाहरण देकर शेष कविताओं को कमतर करने का प्रयास नहीं करूंगा। ऐसा तो इनकी प्रायः प्रत्येक कविता का ही नुष्ट है।

और हाँ, यदि किसी कविता में कृषक अथवा पाठक को हथियार उठाकर क्रान्ति करने के लिए नहीं कहा गया हो तो समझ लीजिए कि वह प्रेम कविता है जबकि सच तो यह है कि राष्ट्रेन्दु शेषेन्द्र ने प्रेम कविताओं को भी क्रान्ति का ही माध्यम बनाने के बार बार प्रयास किये हैं।

हमारे यहाँ तो नायिकाओं का आकर्षित करने के लिए भी नायक के लिए अपना औज, अपनी वीरता, अपनी क्रान्तिकारी भूमिका का प्रदर्शन अत्यन्त आवश्यक माना गया है कि राष्ट्रेन्दु शेषेन्द्र स्वयं भी काव्य शास्त्र में निष्णात हैं।

यदि राष्ट्रेन्दु शेषेन्द्र के ‘खेतों की पुकार’ की कविता पर हम समेकित रूप से दृष्टिपात करें, शैली की दृष्टि से देखें तो शब्द-शब्द में किसी न किसी प्रकृति प्रवृत्त के दर्शन हो जाल स्वाभाविक ही है। वस्तुतः राष्ट्रेन्दु शेषेन्द्र का संस्कृत पाण्डित्य और वाल्मिकि एवं कालीदास के आदित्य की सर्मज्ञता ने इनके काव्य में संस्कृत शब्दों का बाहुल्य इस सीमा तक पहुँचा दिया है कि कई बार तो इनकी तेलुगु रचना भी हिन्दी ... ही प्रतीत होने लगती है। अनुसन्धिसुओं को इनकी उपमाओं इनकी रचनाओं पर कालीदास के प्रभाव और आज की राष्ट्रीय समस्या नक्सलवाद के मूल में इनके विचारों और व्याधीत्व की भूमिका पर गहन शोध करने की आवश्यकता है।

यह तो निश्चित ही था कि इन पंक्तियों में केवल कुछ बिन्दुओं की ओर संकेत मात्र किया जा सकता है। गहराई में जाने की अपेक्षा कहाचित नहीं है, तथापि इतनी अपेक्षा तो की ही जानी चाहिए कि पाठक के मन में एक जिज्ञासा उत्पन्न हो और वह “खेतों की पुकार' की एक एक पंक्ति को, एक एक शब्द को गम्भीरता से ले।

और हाँ मैं दीर्घकाल से साहित्य में जिस राष्ट्रवाद, जिस साम्यवाद और जिस सारल्य का पक्ष लेता रहा हूँ इनमें से प्रथम दो अर्थात् राष्ट्रवाद और साम्यवाद के सामंजस्य की मेरी यदि कल्पना में जिन पूर्ववर्तियों के विचारों की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है, उनमें से राष्ट्रेन्दु शीर्षस्थ हैं। यह भी एक कारण है कि मन से चाहता हूँ कि समस्त राष्ट्र प्रेमी और साम्यवादी इनके साहित्य के मूल तक पहुँचे। वैसे इसे वर्तमान स्वरूप ने दान कराने में विशेष योग दिया है .... समग्रतः तो बस में इतना ही कहना चाहूँगा कि ‘‘खेतों की पुकार' वस्तुतः राष्ट्रेन्दु शेषेन्द्र के हृदय की पुकार है जिसे सुनना प्रत्येक राष्ट्रवादी और साम्यवादी का परम कर्तव्य है।

- विश्रान्त वसिष्ठ

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